मन के हारे हार है मन के जीते जीत

मन के हारे हार है मन के जीते जीत

हम सभी ने ये वाक्य कभी न कभी सुना ही है। मेरे मन में हमेशा एक प्रश्न आता था कि आखिर ये मन है क्या चीज़? कोई स्थूल ग्रन्थि होती तो विज्ञान की कक्षा में अध्यापक ज़रूर रटवाते। स्वयं से यही प्रश्न बार बार किया और उत्तर स्वतः ही मिला कि मन हमारी आत्मा का ही एक अभिन्न चैतन्य हिस्सा है जिसपे अगर मनुष्य लगाम डाल लें तो उसका जीवन सहज और आनंदमय हो जाता है।
व्यक्ति जब कोई भी कार्य करता है तो उसके दो मुख्य परिणाम होते हैं।या तो वो उस कार्य को पूरा कर विजेता बनता है, या फिर हारकर कार्य अधूरा छोड़ देते हैं। कार्य की पूर्ती अपूर्ति का मुख्य बिंदु ये मन ही है। हम अक्सर कह भी तो देते हैं ना कि मेरा मन नही हो रहा या मेरा मन हुआ तो कर लेंगे। जीवन में अक्सर ऐसा अनुभव करते हैं कि जहाँ मन अगर हार स्वीकार कर ले तो जीतता हुआ व्यक्ति भी हार जाता है। वही दूसरी ओर मनुष्य जब मन को अनुशासित कर इन्द्रियों के स्वामी बन जाते हैं तो वह दुर्गम से दुर्गम कार्य भी बड़ी सहजता से कर लेते हैं।इसीलिए कहते हैं मन के हारे हार है मन के जीते जीत। क्योंकि जीत औऱ हार का असल मापदंडक हमारा मन ही है। मन को अनुशासित कर मन पर विजय पाये तभी कार्यों में विजय प्राप्ति कर सकेंगे।
ओम शांति।।।

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